रोजा रखने की दुआ हिंदी में (Roza Rakhne Ki Dua In Hindi) – अरबी, उर्दू, English तर्जुमे के साथ

रमज़ान का महीना शुरू होते ही हर मुसलमान के दिल में रोज़े की नीयत का ख़याल आता है। Roza Rakhne Ki Dua In Hindi उन अल्फ़ाज़ को कहा जाता है जो सेहरी के बाद या रात में अगले दिन के रोज़े की नीयत ज़ाहिर करने के लिए पढ़े जाते हैं।

नीयत असल में दिल का इरादा होती है, लेकिन बहुत से लोग ज़बान से भी यह अल्फ़ाज़ अदा करते हैं ताकि दिल का इरादा और पुख़्ता हो जाए। इस लेख में Roza Rakhne Ki Dua का सही अरबी मतन, रोमन तलफ़्फ़ुज़ और हिंदी तर्जुमा साथ-साथ दिया गया है, ताकि हर कोई आसानी से इसे याद कर सके।

डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह लेख सिर्फ़ तालीमी मक़सद के लिए लिखा गया है। मुकम्मल और तफ़सीली रहनुमाई के लिए किसी मुस्तनद इस्लामी आलिम से मशवरा करें। अगर किसी ग़लती का एहसास हो तो माफ़ी चाहते हैं; बाहरी लिंक्स सिर्फ़ मालूमात के लिए दिए गए हैं, उनकी ज़िम्मेदारी हमारी नहीं।

Table of Contents

रमज़ान में रोज़े की अहमियत

रोज़ा इस्लाम के पाँच बुनियादी अरकान में से एक है। क़ुरआन की सूरह अल-बक़रा में अल्लाह तआला ने ईमान वालों को रोज़ा रखने का हुक्म दिया है, जैसा कि पहली उम्मतों पर भी फ़र्ज़ किया गया था, ताकि बंदों के दिलों में तक़वा (परहेज़गारी) पैदा हो।

रोज़ा सिर्फ़ खाने-पीने से रुकने का नाम नहीं, बल्कि यह सब्र, शुक्र और अल्लाह की क़ुर्बत हासिल करने का ज़रिया है। इसी वजह से रोज़े की शुरुआत एक साफ़ नीयत के साथ करना बहुत अहम माना जाता है, और इसीलिए लोग Roza Rakhne Ki Dua के बारे में जानना चाहते हैं।

नीयत का असल मफ़हूम (Niyyah Kya Hai)

इस्लामी फ़िक़्ह में नीयत का मतलब है दिल में किसी अमल का पक्का इरादा करना। नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की एक मशहूर हदीस है कि हर अमल का दर्जा उसकी नीयत पर मौक़ूफ़ है (सहीह बुख़ारी)। यानी रोज़े का सवाब भी इस बात पर निर्भर करता है कि इंसान ने इसे किस नीयत से रखा है।

ज़्यादातर उलमा का इत्तेफ़ाक़ है कि:

  • नीयत दिल का अमल है, ज़बान से कहना ज़रूरी नहीं।
  • फ़र्ज़ रोज़े (जैसे रमज़ान या क़ज़ा) के लिए नीयत रात से या फ़ज्र से पहले होनी चाहिए।
  • नफ़्ल रोज़े की नीयत दिन में, ज़ुहर से पहले तक भी हो सकती है, बशर्ते कुछ खाया-पिया न हो।

इसी बुनियाद पर Roza Rakhne Ki Dua In Hindi वाली इबारत को समझना ज़रूरी है, जो आगे दी गई है।

रोजा रखने की दुआ (Roza Rakhne Ki Dua In Arabic, English Aur Hindi)

अरबी में (Roza Rakhne Ki Dua In Arabic):

وَبِصَوْمِ غَدٍ نَّوَيْتُ مِنْ شَهْرِ رَمَضَانَ

रोमन तलफ़्फ़ुज़ (Roza Rakhne Ki Dua In Roman English):

Wa bisawmi ghadin nawaytu min shahri Ramadan

अंग्रेज़ी अर्थ (Roza Rakhne Ki Dua In English):

“I intend to keep tomorrow’s fast in the month of Ramadan.”

Roza Rakhne Ki Dua

Roza Rakhne Ki Dua In Hindi

हिंदी तलफ़्फ़ुज़: वबिसौमि ग़दिन नवैतु मिन् शह़्रि रमज़ान

हिंदी अर्थ: ऐ अल्लाह, मैंने रमज़ान के महीने में कल का रोज़ा रखने की नीयत की।

रोजा रखने की दुआ उर्दू और बंगला में

Roza Rakhne Ki Dua In Urdu

میں نے رمضان کے مہینے میں کل کا روزہ رکھنے کی نیت کی۔

Roza Rakhne Ki Dua Bangla

আমি রমজান মাসে আগামীকাল রোজা রাখার নিয়ত করলাম।

लफ़्ज़ बा लफ़्ज़ तर्जुमा (शब्द दर शब्द अर्थ)

अरबी लफ़्ज़ हिंदी मतलब
وَبِصَوْمِ और रोज़े का
غَدٍ कल (आने वाले दिन) का
نَّوَيْتُ मैंने नीयत की
مِنْ شَهْرِ महीने से
رَمَضَانَ रमज़ान

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यह दुआ कब और क्यों पढ़ी जाती है

रोज़े की असल शर्त यह है कि इंसान अपने दिल में अल्लाह की रज़ामंदी के लिए रोज़े का इरादा करे। एक हदीस में हज़रत हफ़्सा (रदियल्लाहु अन्हा) से रिवायत है कि नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया कि जो फ़ज्र से पहले रोज़े की नीयत नहीं करता, उसका रोज़ा नहीं होता (सुनन अबू दाऊद, हदीस नंबर 2454, जिसे अल्लामा अल्बानी ने सही करार दिया है)।

यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि नीयत दिल का काम है, ज़बान से अदा करना शर्त नहीं। Roza Rakhne Ki Dua In Hindi वाली यह मशहूर इबारत किसी मरफ़ू हदीस से साबित नहीं है, बल्कि उलमा के दरमियान यह एक आम और पसंदीदा तरीक़ा रहा है कि लोग अपनी नीयत को अल्फ़ाज़ में भी बयान कर लेते हैं। इसलिए इसे पढ़ना सवाब का काम तो है, मगर फ़र्ज़ नहीं।

फ़िक़्ही मसलक के मुताबिक़ नीयत का वक़्त

अलग-अलग फ़िक़्ही मसलक में नीयत के वक़्त को लेकर थोड़ा फ़र्क़ पाया जाता है। निचे टेबल में मुख़्तसर तौर पर बताया गया है:

मसलक नीयत का वक़्त (फ़र्ज़ रोज़े के लिए)
हनफ़ी रात से लेकर ज़ुहर से कुछ पहले तक
शाफ़ई व हनबली रात ही में, फ़ज्र से पहले ज़रूरी
मालिकी पूरे रमज़ान के लिए एक ही नीयत भी काफ़ी

(यह जानकारी आम फ़िक़्ही किताबों पर आधारित है; किसी ख़ास मसले में अपने मसलक के मुस्तनद आलिम से तसदीक़ कर लें।)

रोजा रखने की दुआ कब पढ़ें

  • सेहरी के बाद, फ़ज्र की अज़ान से पहले।
  • रात को सोने से पहले, अगर सेहरी के लिए उठना मुश्किल हो।
  • अगर नफ़्ल रोज़ा रखना हो तो सुबह ज़ुहर से पहले भी नीयत की जा सकती है, जब तक कुछ खाया न हो।

फ़र्ज़ रोज़े, जैसे रमज़ान के रोज़े या क़ज़ा रोज़े, के लिए नीयत रात से या फ़ज्र से पहले करना ज़रूरी है। अगर कोई दिन में उठ कर फ़र्ज़ रोज़े की नीयत करे, तो वह रोज़ा शुमार नहीं होगा।

रोजा रखने की दुआ की अहमियत

  • यह दुआ दिल को अल्लाह की तरफ़ मुतवज्जेह करती है और रोज़े के मक़सद को ताज़ा करती है।
  • नीयत के अल्फ़ाज़ अदा करने से इबादत में ख़ुशू (तवज्जो) पैदा होता है।
  • बच्चों और नए मुसलमानों के लिए यह आसान ज़रिया है रोज़े की नीयत समझने का।
  • यह इंसान को याद दिलाती है कि रोज़ा सिर्फ़ भूख-प्यास नहीं, बल्कि अल्लाह की इबादत है।
  • रोज़ाना यह दुआ पढ़ने से ज़बान और दिल दोनों इबादत में शामिल हो जाते हैं।

नीयत करते वक़्त आम ग़लतियाँ

  • नीयत को सिर्फ़ रिवाजी अल्फ़ाज़ समझ कर ज़बान से दोहराना, मगर दिल में तवज्जो न होना।
  • सेहरी में सिर्फ़ खाने-पीने में मशगूल हो कर नीयत को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर देना।
  • यह समझना कि अगर ज़बान से अल्फ़ाज़ याद न हों तो रोज़ा नहीं होगा, जबकि दिल का इरादा ही काफ़ी है।
  • फ़र्ज़ और नफ़्ल रोज़े की नीयत के वक़्त में फ़र्क़ न समझना।

रोज़ा खोलने की दुआ का मुख़्तसर ज़िक्र

Roza Rakhne Ki Dua के साथ अक्सर लोग रोज़ा खोलने की दुआ भी जानना चाहते हैं। इफ़्तार के वक़्त मशहूर दुआ यह है:

ذَهَبَ الظَّمَأُ وَابْتَلَّتِ العُرُوقُ وَثَبَتَ الأَجْرُ إِنْ شَاءَ اللَّهُ

तर्जुमा: प्यास चली गई, रगें तर हो गईं और सवाब पुख़्ता हो गया, इंशाअल्लाह (सुनन अबू दाऊद)।

यह दुआ रोजा रखने की दुआ से अलग है और इफ़्तार के वक़्त पढ़ी जाती है, जबकि रोज़ा रखने की नीयत सेहरी के बाद या रात में की जाती है।

निष्कर्ष

Roza Rakhne Ki Dua In Hindi सीखना और समझना हर मुसलमान के लिए रमज़ान में बहुत काम की चीज़ है। असल मक़सद दिल में ख़ालिस नीयत पैदा करना है, और यह अल्फ़ाज़ उस नीयत को मज़ीद मुस्तनद बना देते हैं। सेहरी के बाद या फ़ज्र से पहले यह दुआ पढ़ कर अपने रोज़े की शुरुआत एक पाक इरादे से करें, और अल्लाह से क़बूलियत की दुआ करें। याद रहे कि यह अल्फ़ाज़ कोई जादुई मंतर नहीं हैं, बल्कि दिल के इरादे को मज़ीद पुख़्ता करने का एक ज़रिया हैं। इसलिए जब भी यह दुआ पढ़ें, तो ज़बान के साथ दिल भी हाज़िर रहे, ताकि नीयत में सिद्क़ और ख़ुशू पैदा हो सके।

रमज़ान का हर दिन एक नई शुरुआत की तरह है, और हर रोज़ से पहले नीयत को ताज़ा करना इंसान को अपने मक़सद की याद दिलाता रहता है। चाहे कोई Roza Rakhne Ki Dua In Arabic में पढ़े, Roza Rakhne Ki Dua In English में या अपनी मादरी ज़बान में, अहम बात यह है कि नीयत ख़ालिस अल्लाह की रज़ा के लिए हो। उम्मीद है कि अल्लाह तआला हमारे रोज़ों को क़ुबूल फ़रमाए, हमें इस्तिक़ामत अता करे, और इस रमज़ान को हमारी मग़फ़िरत और नजात का ज़रिया बनाए। आमीन।

? Roza Rakhne Ki Dua से जुड़े आम सवालात (FAQs)

1. रोजा रखने की दुआ कब पढ़ना शुरू करें?

सेहरी के बाद या रात को सोने से पहले यह दुआ पढ़ सकते हैं, फ़ज्र की अज़ान से पहले।

2. क्या Roza Rakhne Ki Dua ज़बान से पढ़ना ज़रूरी है?

नहीं, नीयत दिल में होती है। ज़बान से यह अल्फ़ाज़ पढ़ना एक आम तरीक़ा है, लेकिन शर्त नहीं।

3. Roza Rakhne Ki Dua In Arabic अगर याद न हो तो क्या करें?

अपनी ज़बान में भी नीयत कर सकते हैं, जैसे “मैं कल रमज़ान का रोज़ा रखने वाला/वाली हूँ।” दिल का इरादा ही असल चीज़ है।

4. Roza Rakhne Ki Dua In English बोलना जायज़ है?

हाँ, नीयत किसी भी ज़बान में की जा सकती है, क्योंकि यह दिल का अमल है।

5. अगर सेहरी से पहले नीयत न कर पाएं तो क्या होगा?

फ़र्ज़ रोज़े के लिए नीयत फ़ज्र से पहले ज़रूरी है। अगर भूल हो जाए, तो नफ़्ल रोज़े की तरह नीयत दिन में भी (ज़ुहर से पहले) की जा सकती है, मगर फ़र्ज़ रोज़े का सवाब इससे मुतास्सिर हो सकता है।

6. Roza Rakhne Ki Dua In Urdu और हिंदी में फ़र्क़ है क्या?

सिर्फ़ लिखने का तरीक़ा (स्क्रिप्ट) अलग है, अल्फ़ाज़ और मतलब एक ही हैं।

7. क्या हर रोज़े से पहले यह दुआ दोहराना चाहिए?

रमज़ान के हर दिन के लिए नीयत अलग से ताज़ा करना बेहतर माना जाता है, इसलिए रोज़ यह दुआ पढ़ना मुस्तहसन है।