Mitti Dene Ki Dua यह वह दुआ है जो उस वक़्त पढ़ी जाती है जब इंसान की आँखें बंद हो चुकी हों, जब उसकी साँसें थम चुकी हों, और जब उसे इस मिट्टी की दुनिया से उठाकर उसी मिट्टी में सुपुर्द किया जा रहा हो।
क़ब्र पर मिट्टी देने का वह लम्हा जब मुट्ठी भर ख़ाक अपने हाथ में लेकर किसी अपने को आख़िरी विदाई दी जाती है हर दिल को हिला देता है। ज़बान ख़ामोश हो जाती है, आँखें नम हो जाती हैं, और सीना भारी हो जाता है।
लेकिन इस्लाम ने इस सबसे दर्दनाक लम्हे को भी इबादत में बदल दिया है। अल्लाह तआला ने क़ुरआन मजीद, सूरह ताहा आयत 55 में तीन ऐसे अल्फ़ाज़ रखे हैं जो हर मोमिन के होंठों पर उस वक़्त होने चाहिए जब वह क़ब्र पर मिट्टी दे। यही तीन अल्फ़ाज़ मिलकर Mitti Dene Ki Dua बनाते हैं एक ऐसी दुआ जो हमें हमारी असलियत की याद दिलाती है, हमारे अंजाम से आगाह करती है, और क़यामत का यक़ीन दिल में ताज़ा कर देती है।
Mitti Dene Ki Dua — पूरी अरबी दुआ
क़ुरआन मजीद की सूरह ताहा (20:55) की यह आयत Mitti Dene Ki Dua है:
مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَى
हवाला (Reference): सूरह ताहा, आयत 55 — क़ुरआन मजीद (20:55)
यह दुआ तीन हिस्सों में पढ़ी जाती है। हर बार एक मुट्ठी मिट्टी देते वक़्त एक हिस्सा पढ़ा जाता है। यही नबी करीम ﷺ की सुन्नत है जो सुनन इब्न माजह, हदीस 1565 में वर्णित है।
Mitti Dene Ki Dua — तीन हिस्से
पहली मुट्ठी — पहली बार Mitti Dene Ki Dua
अरबी:
مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ
Transliteration:
Minha Khalaqnaakum
Mitti Dene Ki Dua in English Meaning:
“From it (the earth) We created you.”
Mitti Dene Ki Dua in Hindi अर्थ:
“उसी (मिट्टी) से हमने तुम्हें पैदा किया।”
Mitti Dene Ki Dua in Urdu मतलब:
“اسی (مٹی) سے ہم نے تمہیں پیدا کیا۔”
दूसरी मुट्ठी — दूसरी बार Mitti Dene Ki Dua
अरबी:
وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ
Transliteration:
Wa Feeha Nu’eedukum
Meaning in English:
“And into it We shall return you.”
Hindi अर्थ:
“और उसी (मिट्टी) में हम तुम्हें वापस लौटाएंगे।”
Urdu मतलब:
“اور اسی میں ہم تمہیں واپس لوٹائیں گے۔”
तीसरी मुट्ठी — तीसरी बार Mitti Dene Ki Dua
अरबी:
وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَى
Transliteration:
Wa Minha Nukhrijukum Taaratan Ukhraa
Meaning in English:
“And from it We shall bring you out once again.”
Hindi अर्थ:
“और उसी से एक बार फिर तुम्हें बाहर निकालेंगे।”
Urdu मतलब:
“اور اسی سے ہم تمہیں ایک بار پھر باہر نکالیں گے۔”
Kabr Pe Mitti Dene Ki Dua — पूरा एक साथ
जो लोग Kabr Pe Mitti Dene Ki Dua को एक साथ याद करना चाहते हैं, उनके लिए पूरी दुआ:
अरबी:
مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَى
Transliteration:
Minha Khalaqnaakum, Wa Feeha Nu’eedukum, Wa Minha Nukhrijukum Taaratan Ukhraa
Mitti Dene Ki Dua in English (Full Meaning):
“From the earth We created you, and into it We shall return you, and from it We shall bring you out once again.”
Mitti Dene Ki Dua in Hindi (पूरा अर्थ):
“उसी मिट्टी से हमने तुम्हें पैदा किया, उसी में तुम्हें वापस लौटाएंगे, और उसी से एक बार फिर बाहर निकालेंगे।”
Mayyat Ko Mitti Dene Ki Dua in Urdu (پورا ترجمہ):
“اسی مٹی سے ہم نے تمہیں پیدا کیا، اسی میں واپس لوٹائیں گے اور اسی سے دوبارہ نکالیں گے۔”
Mitti Dene Ki Dua क्या है? — तफ़सील
Mitti Dene Ki Dua वह क़ुरआनी आयत है जो किसी मुसलमान की दफ़न के वक़्त, क़ब्र में मिट्टी डालते समय पढ़ी जाती है। यह सीधे सूरह ताहा, आयत 55 से ली गई है, इसलिए इसकी अहमियत और सेहत (Authenticity) में कोई शक नहीं।
यह दुआ हमें तीन बड़ी सच्चाइयों की याद दिलाती है:
पहली सच्चाई — मिट्टी से पैदाइश: इंसान की असलियत मिट्टी है। अल्लाह तआला ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को मिट्टी से बनाया और उन्हीं की नसल से हम सब हैं। यह याद दिलाता है कि हम कितने भी बड़े हो जाएं, हमारी अस्ल मिट्टी है तकब्बुर और घमंड का कोई मौक़ा नहीं।
दूसरी सच्चाई — मिट्टी में वापसी: हर रूह को मरना है। यह दुनिया वक़्ती है। जो लोग ग़फ़लत में पड़े हैं, उनके लिए क़ब्र की यह ज़मीन सबसे बड़ी नसीहत है।
तीसरी सच्चाई — दोबारा उठाया जाना: क़ब्र मंज़िल नहीं, बल्कि एक पड़ाव है। क़यामत के दिन हर रूह को दोबारा उठाया जाएगा और अल्लाह के सामने हाज़िर होना होगा। यह याद आख़िरत की तैयारी का सबसे बड़ा ज़रिया है।
इसीलिए Mitti Dene Ki Dua सिर्फ़ एक दफ़न की रस्म नहीं यह पूरी इस्लामी ज़िंदगी का निचोड़ है।
Disclaimer: Disclaimer: यह article सिर्फ़ इस्लामी मालूमात और दीनी रहनुमाई के मक़सद से लिखा गया है। इसमें दी गई दुआएं क़ुरआन और हदीस की मुस्तनद किताबों से ली गई हैं। किसी भी दीनी मसले में अपने क़रीबी आलिम या मुफ़्ती से राहनुमाई लें।
Kabr Pe Mitti Dene Ka Sahi Tarika — सही तरीक़ा
नबी करीम ﷺ की सुन्नत के मुताबिक़ Kabr Pe Mitti Dene Ki Dua पढ़ने का एक सही और मुकम्मल तरीक़ा है।
तरीक़ा कदम दर कदम:
कदम 1 — सिरहाने की तरफ खड़े हों क़ब्र के सिरहाने की तरफ़ खड़े होना मुस्तहब है। यह सुन्नत के मुताबिक़ बेहतर मुक़ाम है।
कदम 2 — दोनों हाथों से मिट्टी उठाएं दोनों हाथों से मिलाकर एक मुट्ठी मिट्टी उठाएं। यह ज़्यादा अदब और सुन्नत के क़रीब है।
कदम 3 — पहली मुट्ठी — पहली दुआ पहली मुट्ठी मिट्टी देते हुए पढ़ें:
مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ Minha Khalaqnaakum
कदम 4 — दूसरी मुट्ठी — दूसरी दुआ दूसरी मुट्ठी मिट्टी देते हुए पढ़ें:
وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ Wa Feeha Nu’eedukum
कदम 5 — तीसरी मुट्ठी — तीसरी दुआ तीसरी मुट्ठी मिट्टी देते हुए पढ़ें:
وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَى Wa Minha Nukhrijukum Taaratan Ukhraa
कदम 6 — मय्यत के लिए दुआ करें मिट्टी देने के बाद क़ब्र के पास खड़े रहकर मय्यत के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें। नबी ﷺ ने फ़रमाया कि उस वक़्त मय्यत से सवाल हो रहा होता है, इसलिए उसके लिए इस्तिग़फ़ार और थबात की दुआ करें:
اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَثَبِّتْهُ Allahummaghfir Lahu Wa Thabbithu “ऐ अल्लाह! उसे माफ़ कर दे और उसे (जवाब में) थाबित रख।”
ज़रूरी बातें:
- मिट्टी नर्मी और अदब से डालें — ज़ोर से फेंकें नहीं।
- तीन मुट्ठी ही सुन्नत है — इससे ज़्यादा हाथ से देना दुआ के हिस्से के तौर पर सुन्नत से साबित नहीं।
- बाजमाअत ऊंची आवाज़ में पढ़ना सुन्नत से साबित नहीं — हर शख़्स अपनी आवाज़ में पढ़े।
- यह अमल मुस्तहब (सुन्नत) है, फ़र्ज़ नहीं — लेकिन इस पर अमल करना बड़े सवाब का काम है।
- जब तक लोग मिट्टी न दे लें, वहीं खड़े रहकर दुआ करते रहना बेहतर है।
Mitti Dene Ki Dua — कब पढ़ें?
Mitti Dene Ki Dua पढ़ने का एक ही मुनासिब वक़्त है — दफ़न के दौरान, जब मय्यत को क़ब्र में उतारा जा चुका हो और मिट्टी भरना शुरू हो।
यह दुआ इन मौक़ों पर नहीं पढ़ी जाती:
- दफ़न से पहले
- नमाज़-ए-जनाज़ा के दौरान
- किसी और वक़्त बतौर आम दुआ के
सही वक़्त: जब मय्यत को क़ब्र में रख दिया जाए और मिट्टी भरने की बारी आए ठीक उसी वक़्त।
Mitti Dene Ki Dua के फ़ायदे और अहमियत
1. नबी ﷺ की सुन्नत पर अमल
इस दुआ को पढ़ने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि यह नबी करीम ﷺ की सुन्नत है। सुनन इब्न माजह (हदीस 1565) में वर्णित है कि नबी ﷺ ने क़ब्र में तीन मुट्ठी मिट्टी डाली। सुन्नत पर अमल करना बड़ी इबादत है।
2. आख़िरत की याद दिलाना
क़ब्रिस्तान में खड़े होकर यह दुआ पढ़ना दिल को नर्म करता है और ग़फ़लत से निकालता है। यह एहसास होता है कि हम भी एक दिन इसी मिट्टी में मिल जाएंगे तो अभी से आख़िरत की तैयारी ज़रूरी है।
3. मय्यत की इज़्ज़त और अदब
Mayyat Ko Mitti Dene Ki Dua पढ़कर मिट्टी देना एक इस्लामी अदब का तरीक़ा है जिससे मय्यत की इज़्ज़त होती है। यह बताता है कि उनकी विदाई महज़ एक रस्म नहीं बल्कि इबादत है।
4. सब्र और तसल्ली
जब दिल दर्द से भरा हो और किसी अपने को मिट्टी दे रहे हों, तो यह दुआ एक सुकून देती है। यह दिल को याद दिलाती है कि यह अल्लाह का हुक्म है और उसी की तरफ़ सब कुछ वापस जाना है।
5. अपने अंजाम की फ़िक्र
जब हम किसी की क़ब्र पर खड़े होकर ये अल्फ़ाज़ पढ़ते हैं “मिनहा ख़लक़नाकुम” तो दिल में अपने आप यह सवाल उठता है: “मेरी क़ब्र कब होगी? मैंने क्या तैयारी की है?” यह तफ़क्कुर (सोच-विचार) बेहद क़ीमती है।
6. इस्लामी बिरादरी का एहसास
जब जनाज़े में शामिल सभी लोग एक-एक करके मिट्टी देते हैं और एक ही दुआ के अल्फ़ाज़ उनके होंठों पर होते हैं तो यह इस्लामी एकता और भाईचारे की बेमिसाल तस्वीर है।
दफ़न के बाद क्या पढ़ें?
Kabr Pe Mitti Dene Ki Dua के बाद क़ब्र के पास थोड़ी देर रुकना और मय्यत के लिए दुआ करना सुन्नत है। सुनन अबू दाऊद (हदीस 3221) में है कि नबी ﷺ दफ़न के बाद क़ब्र पर खड़े होते और फ़रमाते:
“अपने भाई के लिए इस्तिग़फ़ार करो और उसके थबात की दुआ करो, क्योंकि अभी उससे सवाल हो रहा है।”
इसके अलावा ये भी पढ़ सकते हैं:
- सूरह फ़ातिहा — मय्यत को सवाब बख़्शने के लिए
- सूरह बक़रा की पहली और आख़िरी आयतें — क़ब्र में हिफ़ाज़त के लिए
- इस्तिग़फ़ार — मय्यत की मग़फ़िरत के लिए
Mitti Dene Ki Dua in Hindi
| बार (Handful) | अरबी | Transliteration | Mitti Dene Ki Dua in Hindi |
|---|---|---|---|
| पहली बार | مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ | Minha Khalaqnaakum | उसी से हमने तुम्हें पैदा किया |
| दूसरी बार | وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ | Wa Feeha Nu’eedukum | उसी में हम तुम्हें वापस लौटाएंगे |
| तीसरी बार | وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَى | Wa Minha Nukhrijukum Taaratan Ukhraa | उसी से एक बार फिर निकालेंगे |
Mitti Dene Ki Dua in Urdu
| بار (Handful) | عربی | Transliteration | Mitti Dene Ki Dua in Urdu |
|---|---|---|---|
| پہلی بار | مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ | Minha Khalaqnaakum | اسی سے ہم نے تمہیں پیدا کیا |
| دوسری بار | وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ | Wa Feeha Nu’eedukum | اسی میں ہم تمہیں واپس لوٹائیں گے |
| تیسری بار | وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَى | Wa Minha Nukhrijukum Taaratan Ukhraa | اسی سے ہم تمہیں دوبارہ نکالیں گے |
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निष्कर्ष (Conclusion)
Mitti Dene Ki Dua सिर्फ़ तीन वाक्यों में पूरी इंसानी ज़िंदगी का सार समेटे हुए है। सूरह ताहा की इस आयत में अल्लाह तआला ने हमें हमारी पैदाइश, हमारी मौत और हमारे दोबारा उठाए जाने की याद दिलाई है।
जब आप क़ब्र के पास खड़े होकर वह मिट्टी अपने हाथों में उठाते हैं और Mitti Dene Ki Dua in Hindi या अरबी में ये अल्फ़ाज़ पढ़ते हैं तो आप महज़ एक रस्म नहीं अदा कर रहे। आप अल्लाह की रबूबियत का इक़रार कर रहे हैं, आख़िरत पर यक़ीन का इज़हार कर रहे हैं, और मय्यत को उसके रब के हवाले कर रहे हैं।
अल्लाह तआला हमारे सभी मरहूम अज़ीज़ों की क़ब्रों में रहमत नाज़िल फ़रमाए, उन्हें माफ़ करे, और हम सबको एक हुस्न-ए-ख़ातिमा नसीब करे। आमीन।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. Mitti Dene Ki Dua क्या है?
Mitti Dene Ki Dua वह क़ुरआनी आयत है जो दफ़न के वक़्त क़ब्र में मिट्टी डालते हुए पढ़ी जाती है। यह सूरह ताहा (20:55) से ली गई है और इसका मतलब है: “उसी मिट्टी से हमने तुम्हें पैदा किया, उसी में लौटाएंगे और उसी से दोबारा उठाएंगे।”
Q2. Kabr Pe Mitti Dene Ki Dua कितनी बार पढ़ी जाती है?
यह दुआ तीन बार पढ़ी जाती है हर बार एक मुट्ठी मिट्टी के साथ एक हिस्सा पढ़ा जाता है। तीन मुट्ठी मिट्टी देना और हर बार एक वाक्य पढ़ना नबी ﷺ की सुन्नत से साबित है।
Q3. क्या Mitti Dene Ki Dua क़ुरआन से है?
जी हाँ, बिल्कुल। Mitti Dene Ki Dua सीधे क़ुरआन मजीद, सूरह ताहा, आयत 55 से ली गई है। यही इस दुआ की सबसे बड़ी ख़ूबी और authenticity है।
Q4. क्या Mayyat Ko Mitti Dene Ki Dua पढ़ना फ़र्ज़ है?
नहीं। यह मुस्तहब (सुन्नत) है, फ़र्ज़ नहीं। लेकिन चूंकि यह नबी ﷺ की सुन्नत से साबित है, इसलिए इस पर अमल करना बड़े सवाब का काम है।
Q5. क्या औरतें भी Kabr Pe Mitti De Sakti Hain?
जी हाँ, औरतें भी मिट्टी दे सकती हैं और दुआ पढ़ सकती हैं। इस्लामी शरीअत में इसकी कोई मनाही नहीं है। हालांकि कुछ इलाक़ों में रिवाजात अलग हो सकते हैं, लेकिन शरीअत में यह जायज़ है।
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